std 9 hindi chapter 9 vardan mangunga nahi question answer | पाठ 9 वरदान मांगूंगा नहीं स्वाध्याय उत्तर इयत्ता नववी
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निम्नलिखित शब्दों के आधार पर कहानी लिखिए तथा उसे उचित शीर्षक दीजिए:-
कृति के आवश्यक सोपान :
अंतरिक्ष
पुस्तक
कैमरा
उत्तर:
शीर्षक: स्मृतियों के साथ अंतरिक्ष की ओर
खुशी के मारे उसके पाँव जमीन पर नहीं पड़ रहे थे। नासा से बाहर आते ही उसने घर का नंबर मिलाया। “पापा!” उससे बोला नहीं गया। “हमारी बेटी ने किला फतह कर लिया! है न?” “हाँ, पापा!” वह चहकी, “मैंने नासा में प्रवेश पानेवाली परीक्षा पास कर ली है। मेरिट में पहले नंबर पर हूँ।” “शाबाश! मुझे पता था हमारी बेटी लाखों में एक है!” “पापा, पंद्रह मिनट के ब्रेक के बाद एक औपचारिक इंटरव्यू और होना है। उसके फौरन बाद मुझे ‘नासा अंतरिक्ष प्रवेश कार्ड‘ दिया जाएगा। मम्मी को फोन देना” “तुम्हारी मम्मी सब्जी लेने गई है। आते ही बात कराता हूँ। आल द बेस्ट, बेटा!”
उसकी आँखें भर आई। पापा की छोटी-सी नौकरी थी, लेकिन उन्होंने बैंक से कर्जा लेकर अपनी दोनों बेटियों को उच्च शिक्षा दिलवाई थी। मम्मी-पापा की आँखों में तैरते सपनों को हकीकत में बदलने का अवसर आ गया था। उसे याद आए अपने वह बचपन के दिन, वह बरगद का वृक्ष, जिसके नीचे बैठकर वह लगातार अंतरिक्ष की ओर देखा करती थी। उसी वृक्ष के नीचे बैठकर वह अंतरिक्ष संबंधी पुस्तकें पढ़ा करती थी।
उसे याद आया, वह कैमरा, जो उसके पापा ले आए थे। उसी कैमरे को आँखों के सामने पकड़कर वह अंतरिक्ष की ओर देखती थी। बचपन की वह यादें, वह वृक्ष, पुस्तक और कैमरा मानो उसे पुकार पुकार कर कहे रहे थे- दिव्या तुम सचमुच दिव्य हो, अब तुम अंतरिक्ष का भ्रमण करने निकलोगी। क्या हमें साथ लेकर नहीं चलोगी ?
Vardan Mangunga Nahi 9th class hindi question answer
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‘गणतंत्र दिवस‘ के अवसर पर जनतांत्रिक शासन प्रणाली पर अपना मंतव्य प्रकट कीजिए ।
उत्तर:
इतिहास के पन्नों को पलटें तो एक ऐसा दौर दिखाई देता है जब पूरी दुनिया छोटी-छोटी रियासतों और राजशाही के साए में जी रही थी। उस समय व्यवस्था का केंद्र केवल ‘राजा‘ हुआ करता था, जिसके मुंह से निकले शब्द ही देश के अटूट कानून बन जाते थे और उनके द्वारा लिए गए फैसले ही अंतिम अदालती निर्णय होते थे। सत्ता और अधिकारों की सारी कमान राजाओं की मुट्ठी में बंद थी, जिसके कारण आम जनता का जीवन किसी दोयम दर्जे के गुलाम से कम नहीं हुआ करता था और उन्हें अपने अधिकारों के लिए तरसना पड़ता था।
समय का पहिया घूमा और वैश्विक पटल पर एक युगांतरकारी परिवर्तन आया, जिससे शासन की बागडोर धीरे-धीरे राजाओं के हाथों से निकलकर सीधे जनता के हाथों में सौंप दी गई। इस नई राजनीतिक व्यवस्था में, आम नागरिकों को एक निश्चित समय अवधि के लिए अपने मनपसंद प्रतिनिधियों को चुनने का अधिकार मिला। इस व्यवस्था का सबसे खूबसूरत पहलू यह है कि अब आम जनता को अपने सुख-दुख, अपनी माँगें और अपनी शिकायतें अपने ही चुने हुए प्रतिनिधियों के सामने खुलकर रखने का वैधानिक अधिकार प्राप्त हो गया है।
लोकतंत्र नागरिकों को अपनी पसंद की सरकार चुनने की आज़ादी तो देता है, लेकिन इस बात की कोई शत-प्रतिशत गारंटी नहीं होती कि चुने हुए प्रतिनिधि जनता की उम्मीदों पर हमेशा खरे ही उतरेंगे। इसी अनिश्चितता के कारण आज की प्रजातांत्रिक व्यवस्था में भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद और किसी भी हथकंडे को अपनाकर कुर्सी पर हमेशा के लिए काबिज़ रहने की लालसा रखने वाले राजनेताओं की बाढ़ आ गई है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि जनतांत्रिक शासन प्रणाली दुनिया की सबसे उत्तम व्यवस्था है, परंतु इसे वास्तविक रूप से सफल बनाने के लिए चुने हुए प्रतिनिधियों के भीतर ‘नैतिकता‘ और ‘जवाबदेही‘ का होना सबसे अनिवार्य शर्त है, तभी हमारा गणतंत्र सही मायनों में मजबूत बन सकता है।
Vardan Mangunga Nahi 9th class hindi workbook answers
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किसी अवकाश प्राप्त सैनिक से उनके अनुभव सुनिए और उनसे प्रेरणा लीजिए।
उत्तर:
कड़ा अनुशासन और समयबद्धता: सेना का जीवन हमें सिखाता है कि सफलता के लिए नियमों का पालन और समय का सही प्रबंधन कितना अनिवार्य है।
विपरीत परिस्थितियों में साहस: शून्य से नीचे के तापमान और झुलसाती गर्मियों में भी सीमाओं की रक्षा करना हमें विपरीत परिस्थितियों में धैर्य रखना और कभी हार न मानना सिखाता है।
निःस्वार्थ राष्ट्रसेवा: सैनिक अपने व्यक्तिगत स्वार्थ और भेदों से ऊपर उठकर देश की रक्षा को सर्वोपरि मानते हैं, जो हमें एक जिम्मेदार नागरिक बनने की प्रेरणा देता है।
9th class hindi Vardan Mangunga Nahi
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‘जीवन में परिश्रम का महत्त्व पर‘ अपने विचार लिखिए।
उत्तर:
परिश्रम केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि मानव अस्तित्व को सार्थकता देने वाला सबसे सशक्त माध्यम है। इतिहास गवाह है कि मनुष्य ने अपनी मेहनत के बल पर ही आदिम युग से लेकर आधुनिक विज्ञान तक का सफर तय किया है। अपने श्रम के दम पर ही उसने भोजन, वस्त्र और आशियाने का निर्माण कर खुद को अन्य प्राणियों से श्रेष्ठ और सुरक्षित बनाया। संसार में आज हम जो भी महान उपलब्धियाँ या चमत्कारी आविष्कार देखते हैं, वे सब इंसानी पसीने और अटूट संकल्प का ही परिणाम हैं। जो व्यक्ति श्रम को अपना साथी बना लेता है, उसकी उन्नति को समय की कोई भी बाधा रोक नहीं सकती। विश्व के जितने भी महान नायक हुए हैं, उनकी महानता का रहस्य उनकी प्रतिभा से ज्यादा उनके जीवन भर का अथक और निरंतर परिश्रम रहा है।
श्रम को यदि एक पावन तपस्या कहा जाए तो अतिशयोक्ति नहीं होगी, क्योंकि इस अग्नि में तपकर निखरा हुआ इंसान खरे सोने की भाँति चमकता है और समाज का नेतृत्व करता है। इस साधना की कोई सीमा नहीं है; यह मनुष्य का श्रम ही है जो उसे समुद्र की अथाह गहराइयों से मोती निकालने का हौसला देता है और धरती का सीना चीरकर सोना-चाँदी जैसी अमूल्य धातुएँ बाहर ले आता है। लोक-कहावत भी यही सिखाती है कि जो स्वयं की मदद के लिए पसीना बहाता है, ईश्वर भी उसी का हाथ थामता है। कर्मठ व्यक्ति कभी किसी झूठे भाग्य के भरोसे नहीं बैठता, बल्कि वह अपनी मेहनत की स्याही से अपना मुकद्दर खुद लिखता है।
इस जीवन-दर्शन का सबसे सुंदर पहलू यह है कि निरंतर परिश्रम करने वाला व्यक्ति न केवल शारीरिक और मानसिक रूप से पूर्णतः स्वस्थ रहता है, बल्कि उसके भीतर हर विपरीत परिस्थिति से लड़ने की एक अद्भुत और अदम्य क्षमता विकसित हो जाती है। अंततः, यदि मनुष्य को इस संसार में वास्तविक सुख, संतोष और आत्मनिर्भरता प्राप्त करनी है, तो कर्म की राह पर चलना ही एकमात्र मार्ग है।
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कविवर्य रवींद्रनाथ टैगोर की कविता पढ़िए।
उत्तर:
1. मेरा शीश नवा दो
मेरा शीश नवा दो अपनी, चरण-धूल के तल में।
देव ! डुबा दो अहंकार सब, मेरे आँसू-जल में।
अपने को गौरव देने को, अपमानित करता अपने को,
घेर स्वयं को घूम-घूम कर, मरता हूं पल-पल में।
देव ! डुबा दो अहंकार सब, मेरे आँसू-जल में।
अपने कामों में न करूं मैं, आत्म-प्रचार प्रभो;
अपनी ही इच्छा मेरे, जीवन में पूर्ण करो।
मुझको अपनी चरम शांति दो, प्राणों में वह परम कांति हो,
आप खड़े हो मुझे ओट दें, हृदय-कमल के दल में।
देव ! डुबा दो अहंकार सब, मेरे आँसू-जल में।
2. मन जहां डर से परे है
मन जहां डर से परे है और सिर जहां ऊंचा है;
ज्ञान जहां मुक्त है; और जहां दुनिया को संकीर्ण घरेलू दीवारों से
छोटे छोटे टुकड़ों में बांटा नहीं गया है;
जहां शब्द सच की गहराइयों से निकलते हैं;
जहां थकी हुई प्रयासरत बांहें त्रुटि हीनता की तलाश में हैं;
जहां कारण की स्पष्ट धारा है जो सुनसान रेतीले मृत आदत के
वीराने में अपना रास्ता खो नहीं चुकी है;
जहां मन हमेशा व्यापक होते विचार और सक्रियता में
तुम्हारे जरिए आगे चलता है और आजादी के स्वर्ग में पहुंच जाता है
ओ पिता मेरे देश को जागृत बनाओ।
९. वरदान माँगूँगा नहीं स्वाध्याय
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(१) सूचना के अनुसार कृतियाँ पूर्ण कीजिए :-
(क) कवि इन परिस्थितियों में वरदान नहीं माँगना चाहते –
उत्तर:
१. तिल-तिल मिटने की नौबत आने की स्थिति में।
२. अपने सुख देने वाले क्षणों को यादगार बनाने तथा अपनी भग्न आकांक्षाओं की पूर्ति करने की स्थिति में।
३. हार को जीत में बदलने की स्थिति में।
४. ताप और अभिशाप देने की स्थिति में।
(ख) आकृति पूर्ण कीजिए
(२) पद्य में पुनरावर्तन हुई पंक्ति लिखिए।
उत्तर:
पद्य में पुनरावर्तन हुई पंक्ति: वरदान माँगूँगा नहीं ।।
(३) रेखांकित वाक्यांश के स्थान पर उचित मुहावरा लिखिए :- रुग्ण शय्या पर पड़ी माता जी को देखकर मोहन का धीरज धीर-धीरे समाप्त हो रहा था। (तिल-तिल मिटना, जिस्म टूटना)
उत्तर: रुग्ण शय्या पर पड़ी माता जी को देखकर मोहन का धीरज तिल-तिल मिट रहा था।
९. वरदान माँगूँगा नहीं स्वाध्याय | Vardan Mangunga Nahi class 9 question answer
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निम्नलिखित अशुद्ध वाक्यों को शुद्ध करके फिर से लिखिए :-
उत्तर:
|
अशुद्ध वाक्य |
शुद्ध वाक्य |
|
१. लता कितनी मधुर गाती है। |
लता कितना मधुर गाती है। |
|
२. तितली के पास सुंदर पंख होते हैं। |
तितली के सुंदर पंख होते हैं। |
|
३. यह भोजन दस आदमी के लिए है। |
यह भोजन दस लोगों के लिए है। |
|
४. कश्मीर में कई दर्शनीय स्थल देखने योग्य है। |
कश्मीर में कई दर्शनीय स्थल हैं। |
|
५. उसने प्राण की बाजी लगा दी। |
उसने प्राणों की बाजी लगा दी। |
|
६. तुमने मिट्टी से का प्यार। |
तुमने मिट्टी से किया प्यार। |
|
७. यह है न पसीने का धारा। |
यह है न पसीने की धार। |
|
८. आओ सिंहासन में बैठो। |
आओ, सिंहासन पर बैठो। |
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९. हम हँसो कि फूले-फले देश। |
तुम हँसो, ताकि फूले-फले देश। |
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१०. यह गंगा का है नवल धार। |
यह गंगा की है नवल धार। |
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}
उत्तर:
**माझा अभ्यास**

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