दो लघुकथाएँ स्वाध्याय हिंदी आठवी | आठवी हिंदी digest
* सूचना के अनुसार कृतियाँ करो :-
(१) संजाल पूर्ण करो :
(२) उत्तर लिखो :
उत्तर:
Do Laghukathae question answer | Do Laghukathae
Do Laghukathae question answer pdf | दो लघुकथाएँ स्वाध्याय
(३) विधानों के सामने चौखट में सही चिह्न लगाओ :
१.
जिह्वा ने अविवेक पूर्ण उत्तर दिया।
उत्तर: गलत
२.
दाँत घमंडी थे।
उत्तर:सही
३. सभी
अपराधियों को नियमानुसार सजा नहीं हुई।
उत्तर: गलत
४.
ठेकेदार पुराना था।
उत्तर: गलत
दो लघुकथाएँ स्वाध्याय हिंदी
(3) उचित जोड़ियाँ मिलाओ :
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अ |
उत्तर |
आ |
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१. बहुमंजिला |
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१. ईमानदार |
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२. अधिकारी |
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२. इमारत |
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३. नया ठेकेदार |
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३. भ्रष्ट |
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४. सार्वजनिक समारोह |
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४. अनुभवी |
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५. सम्मान |
उत्तर:
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अ |
उत्तर |
आ |
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१. बहुमंजिला |
इमारत |
१. ईमानदार |
|
२. अधिकारी |
भ्रष्ट |
२. इमारत |
|
३. नया ठेकेदार |
ईमानदार |
३. भ्रष्ट |
|
४. सार्वजनिक समारोह |
सम्मान |
४. अनुभवी |
|
|
|
५. सम्मान |
निम्नलिखित
शब्दों के आधार पर मुहावरे लिखकर उनका अपने वाक्यों में प्रयोग करो।
उत्तर :
1) ईंट- ईंट से ईंट बजाना-सर्वनाश
करना।
राम जी
ने रावण की सेना की ईंट से ईट बाजा दी।
2) जान-जान से हाथ धोना-मारे जाना।
देश की
आजादी के लिए कई क्रांतिकारियों को जान से हाथ धोना पड़ा।
3) पानी- पानी पानी होना-लज्जित
होना।
अपने
बेटे की करतूतों से शर्मा जी शर्म से पानी पानी हो गए।
4) खिचड़ी- अपनी खिचड़ी अलग पकाना
- अलग-अलग रहना।
देश
बरबादी की दहलीज पर है पर लोग अपनी अलग अलग खिचड़ी पका रहे है।
दो लघुकथाएँ digest pdf | दो लघुकथाएँ question answer pdf
'जल के अपव्यय की रोकथाम' संबंधी चित्रकला प्रदर्शनी का
आकर्षक विज्ञापन तैयार करो।
जोशी जी की नींव कथा से मैंने समझा की बुराइयों का
परिणाम सदैव बुरा होता है। हमें सदैव बुरे कार्यों से दूर रहना चाहिए और दूसरों को
भी यही शिक्षा देनी चाहिए। जीभ का वर्चस्व कथा से मैंने समझा कि हमें सदैव
विनम्रता से कार्य करना चाहिए। कठोरता का परिणाम सदैव बुरा होता है। अहंकार से
हमेशा हमारा सिर नीचा ही होता है।
किसी
ग्रामीण और शहरी व्यक्ति की दिनचर्या की तुलनात्मक जानकारी प्राप्त करके आपस में
चर्चा करो।
उत्तर:
ग्रामीण
व्यक्ति:
ग्रामीण व्यक्ति सूरज उगने से पहले ही जाग जाता है। भोर
में उठकर वह अपने पाले हुए जीव-जंतुओं को चारा-पानी देता है और यदि घर में
गाय-भैंस हों तो उनका दूध दुहता है। इसके बाद वह स्नान करके मंदिर जाता है और
पूजा-पाठ करता है। फिर वह भोजन करके खेतों में काम करने निकल जाता है, हल चलाता है
और दोपहर को समय पर भोजन करता है। वह हमेशा शुद्ध और सादा भोजन करता है। शाम को वह
घर लौटकर फिर से अपने जीव-जंतुओं को चारा-पानी देता है और दूध दुहता है। अंत में
हाथ-मुँह धोकर या पूजा-पाठ करके परिवार के साथ समय बिताता है।
शहरी
व्यक्ति:
शहरी व्यक्ति सूरज उगने के बाद बिस्तर छोड़ता है। कई बार
वह बिना मुँह-हाथ धोए पहले चाय पी लेता है और फिर बाथरूम में नहाने-धोने जाता है।
देर से उठने के कारण उसे दफ्तर जाने में जल्दी होती है, इसलिए कभी-कभी वह बिना नाश्ता
किए ही निकल पड़ता है। बाहर वह दोपहर में तेल-मसाले से बना भारी भोजन करता है, जिससे उसकी
तबीयत अक्सर खराब हो जाती है। शाम को वह अपनी गाड़ी से घर लौटता है, लेकिन देर हो
जाती है। थकान मिटाने के लिए वह नशा करता है और कई बार बिना भोजन किए ही सो जाता
है।
'विनम्रता सारे सद्गुणों की नींव
है' विषय पर अपने मन के भाव लिखो।
उत्तर:
मेरे विचार से विनम्रता मनुष्य का सबसे सुंदर गुण है।
विनम्रता का अर्थ है—नम्र स्वभाव रखना, दूसरों का सम्मान करना और घमंड से दूर रहना। जो व्यक्ति
विनम्र होता है, वही सच्चे अर्थों में महान कहलाता है।
विनम्र व्यक्ति कभी अपने ज्ञान, धन या शक्ति का घमंड नहीं करता।
वह हमेशा सबके साथ प्रेम और आदर से बात करता है। ऐसे व्यक्ति के व्यवहार में मिठास
होती है, जिससे लोग उससे जुड़ना पसंद करते हैं। विनम्रता के बिना ज्ञान अधूरा और
शक्ति निरर्थक लगती है।
मेरे अनुसार विनम्रता सभी सद्गुणों की नींव इसलिए है
क्योंकि सत्य, करुणा, दया, सहनशीलता और सहयोग जैसे गुण तभी विकसित होते हैं, जब व्यक्ति के मन में विनम्रता
होती है। जो व्यक्ति अहंकारी होता है, वह न तो किसी की बात सुनता है और न ही किसी से कुछ सीख
पाता है।
हमारे जीवन में विनम्रता का बहुत महत्व है। घर में
माता-पिता और गुरुजनों के प्रति विनम्र रहना हमें संस्कारी बनाता है। विद्यालय में
शिक्षकों और मित्रों के साथ विनम्र व्यवहार करने से हमारा व्यक्तित्व निखरता है।
विनम्र छात्र ही आगे चलकर अच्छा नागरिक बनता है।
अंत में मैं यही कहना चाहूँगा कि विनम्रता मनुष्य को
ऊँचा उठाती है। हमें हमेशा विनम्र रहकर अच्छे गुणों को अपनाना चाहिए, क्योंकि सच
में विनम्रता ही सारे सद्गुणों की नींव है।
दो लघुकथाएँ question answer | Do Laghukathae swadhyay
'इंद्रधनुष के सात रंग, रहें हमेशा संग-संग' इस कथन के
आधार पर कहानी बनाकर अपने सहपाठियों के सामने प्रस्तुत करो।
इंद्रधनुष के सात रंग, रहें हमेशा संग-संग
एक छोटे से गाँव में सात दोस्त रहते थे। वे एक ही कक्षा
में पढ़ते थे और एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे। उनके नाम थे—लाल, नारंगी, पीला, हरा, नीला, जामुनी और
बैंगनी। संयोग से उनके नाम इंद्रधनुष के सात रंगों पर रखे गए थे। गाँव के लोग कहते
थे कि ये सातों दोस्त इंद्रधनुष के रंगों जैसे हैं—अलग-अलग होकर भी एक साथ बहुत
सुंदर।
एक दिन गाँव में भारी बारिश हुई। बारिश के बाद आकाश में
एक सुंदर इंद्रधनुष दिखाई दिया। सभी बच्चे खुशी से उछल पड़े। तभी गाँव में एक
समस्या आ गई। तेज़ बारिश से स्कूल की छत टपकने लगी और कक्षा में पढ़ाई रुक गई।
बच्चे परेशान हो गए।
सातों दोस्तों ने मिलकर समस्या हल करने का निश्चय किया।
लाल ने हिम्मत दिखाई और बोला, “हमें डरना
नहीं चाहिए।” नारंगी ने सबको उत्साहित किया। पीले ने अच्छी योजना
बनाई। हरे ने मेहनत से काम किया। नीले ने शांति बनाए रखी। जामुनी ने सबको समझदारी
से जोड़े रखा और बैंगनी ने सबका साथ निभाया।
सभी मिलकर शिक्षकों और गाँव वालों की मदद से स्कूल की छत
ठीक करवा दी। कुछ ही समय में कक्षा फिर से शुरू हो गई। शिक्षक ने बच्चों की सराहना
की और कहा, “तुम सब
इंद्रधनुष के सात रंगों की तरह हो—अलग-अलग गुणों के बावजूद एकता में शक्ति है।”
उस दिन बच्चों ने समझा कि जैसे इंद्रधनुष के सात रंग
मिलकर सुंदर दृश्य बनाते हैं, वैसे ही हम सब मिलकर रहें तो हर कठिनाई आसान हो जाती है।
शिक्षा: एकता और
सहयोग से हर समस्या का समाधान संभव है।
किसी
समारोह का वर्णन उचित विराम, बलाधात, तान-अनुतान के साथ 'एकाग्रता' से सुनो और यथावत
सुनाओ।
वार्षिक समारोह का वर्णन
आज मैं अपने
विद्यालय में आयोजित वार्षिक
समारोह का वर्णन प्रस्तुत कर रहा/रही हूँ। कृपया इसे एकाग्रता से
सुनें।
हमारे
विद्यालय का वार्षिक समारोह बड़े हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। समारोह का आयोजन विद्यालय
के विशाल प्रांगण में किया गया था। मंच को रंग-बिरंगे गुब्बारों, फूलों और रोशनी से बहुत सुंदर ढंग से सजाया गया था। पूरे वातावरण में
उत्साह और उमंग का भाव था।
कार्यक्रम का
शुभारंभ दीप प्रज्वलन से हुआ। इसके बाद विद्यालय के छात्रों ने मधुर सरस्वती वंदना प्रस्तुत की।
वंदना सुनकर पूरा सभागार शांत और भावपूर्ण हो गया। इसके पश्चात प्रधानाचार्य महोदय
ने स्वागत भाषण दिया और विद्यार्थियों को परिश्रम व अनुशासन का महत्व बताया।
फिर
सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुए। किसी ने देशभक्ति गीत गाया, तो किसी ने मनमोहक नृत्य प्रस्तुत किया। नाटक में सामाजिक संदेश दिया गया,
जिसे सभी ने ध्यानपूर्वक देखा और सराहा। हर प्रस्तुति पर दर्शकों की
तालियों की गूंज सुनाई देती रही।
अंत में
पुरस्कार वितरण हुआ। जिन विद्यार्थियों ने पढ़ाई, खेल और अन्य
गतिविधियों में उत्कृष्ट प्रदर्शन किया था, उन्हें सम्मानित
किया गया। समारोह का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ।
यह समारोह
मेरे लिए बहुत यादगार रहा। इससे हमें आत्मविश्वास, अनुशासन और
एकता का महत्व समझ में आया।
श्रमनिष्ठा
का महत्त्व बताने वाला कोई निबंध पढ़ो।
श्रमनिष्ठा का महत्त्व
श्रमनिष्ठा का अर्थ है—परिश्रम के प्रति निष्ठा, ईमानदारी और
लगन। यह मनुष्य का वह गुण है, जो उसे सफलता के मार्ग पर आगे बढ़ाता है। कहा जाता है कि
भाग्य भी उसी का साथ देता है, जो मेहनत करता है। बिना श्रम के जीवन में कोई भी लक्ष्य
प्राप्त नहीं किया जा सकता।
श्रमनिष्ठ व्यक्ति अपने कार्य को पूरे मन से करता है। वह
कठिनाइयों से डरता नहीं, बल्कि उन्हें चुनौती समझकर स्वीकार करता है। ऐसे व्यक्ति
को सफलता भले ही देर से मिले, लेकिन वह स्थायी और सम्मानजनक होती है। किसान खेत में
दिन-रात मेहनत करता है, तभी हमें अन्न मिलता है। मजदूर, शिक्षक, डॉक्टर और विद्यार्थी—सभी के
जीवन में श्रम का विशेष महत्व है।
विद्यार्थी जीवन में श्रमनिष्ठा का महत्व और भी बढ़ जाता
है। जो छात्र नियमित अध्ययन करते हैं, समय का सही उपयोग करते हैं और अभ्यास में लगे रहते हैं, वही परीक्षा
में अच्छा प्रदर्शन करते हैं। केवल बुद्धि से नहीं, बल्कि निरंतर परिश्रम से ही
ज्ञान में वृद्धि होती है।
श्रमनिष्ठा हमें आत्मनिर्भर बनाती है। मेहनती व्यक्ति
दूसरों पर निर्भर नहीं रहता और अपने बल पर आगे बढ़ता है। समाज और राष्ट्र की
प्रगति भी श्रमनिष्ठ नागरिकों पर ही निर्भर करती है। आलस्य और प्रमाद मनुष्य को
पीछे धकेल देते हैं, जबकि परिश्रम उसे ऊँचाइयों तक पहुँचाता है।
अंत में यही कहा जा सकता है कि श्रमनिष्ठा जीवन की सफलता
की कुंजी है। हमें हर कार्य को पूरी ईमानदारी और मेहनत से करना चाहिए, क्योंकि श्रम
से ही सम्मान, सुख और समृद्धि प्राप्त होती है।
किसी समारोह के मुख्य बिंदुओं, एवं मुद्दों को पढ़ो। इनका पुनः स्मरण करके लिखो।
हाल ही में
हमारे विद्यालय में वार्षिक समारोह का आयोजन किया गया था। यह समारोह बहुत ही भव्य
और अनुशासित ढंग से संपन्न हुआ। कार्यक्रम की शुरुआत दीप प्रज्वलन और सरस्वती
वंदना से हुई। इसके बाद विद्यालय के प्रधानाचार्य महोदय ने स्वागत भाषण दिया, जिसमें उन्होंने विद्यार्थियों की उपलब्धियों और विद्यालय की प्रगति पर
प्रकाश डाला। समारोह में सांस्कृतिक कार्यक्रमों जैसे नृत्य, गीत और नाटक की सुंदर प्रस्तुतियाँ दी गईं, जिनमें
विद्यार्थियों ने अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया।
समारोह
का एक महत्वपूर्ण मुद्दा विद्यार्थियों को शिक्षा के साथ-साथ संस्कार देने पर था।
मुख्य अतिथि ने अपने भाषण में अनुशासन, मेहनत और समय के महत्व
को समझाया। अंत में मेधावी विद्यार्थियों को पुरस्कार देकर सम्मानित किया गया,
जिससे सभी छात्रों में उत्साह और प्रेरणा का संचार हुआ। कार्यक्रम
का समापन राष्ट्रगान के साथ हुआ। यह समारोह हमें एकता, परिश्रम
और आत्मविश्वास का संदेश देकर समाप्त हुआ।
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